विस्तृत प्रांगण तिरछी लम्बी पगडंडी अभी बस हलकी चहल-पहल , विश्वविद्यालय में, दूर; उस सिरे से आती तुम गंभीर, किन्तु सौम्य, मद्धिम-मद्धिम तुम में एक मीठा तनाव है, शायद, हर एक-एक कदम पर जैसे सुलझा रही हो, एक-एक प्रश्न. तुम्हे पता हो, जैसे चंचल रहस्य. तुम्हें ‘पहचान’ नहीं सका था, मै, क्योंकि; देखा ही पहली [...]




आपने फ़रमाया...