हर आहट, वो सरसराहट लगती है, जैसे डाल गया हो डाकिया; चिट्ठी दरवाजे के नीचे से. अब, हर आहट निराश करती है. हर महीने टुकड़ों में मिलने आती रही तुम देती दस्तक सरसराहटों से . सारी सरसराहटों से पूरी आहट कभी ना बना सके मै. तुम्हारे शब्दों से बिम्ब उकेरता मै, तुम्हे देख पाने के लिए…कागज [...]




आपने फ़रमाया...