
लिखूं,
कुछ डायरी के पृष्ठों पर कुछ घना-सघन,
जो घटा हो..मन में या तन से इतर.
लिखूं, पत्तों का सूखना
या आँगन का रीतना
कांव-कांव और बरगद की छांव
शहर का गांव में दबे-पांव आना या
गाँव का शहर के किनारे समाना या,
लिखूं माँ का साल दर साल बुढाना
कमजोर नज़र और स्वेटर का बुनते जाना
मेरी शरीर पर चर्बी की परत का चढ़ना
मन के बटुए का खाली होते जाना…
इस डायरी के पृष्ठों पर समानांतर रेखाएं हैं;
जीवन तो खुदा हुआ है ,बर-बस इसपर.
अब, और इतर क्या लिखना न कुछ पाना,
न कुछ खोना.




Posted by shreesh k. pathak on अक्टूबर 15, 2009 at 2:05 पूर्वाह्न
ज्यादातर कवितायेँ ब्लोग्स में पहले ही आ चुकी हैं, यहाँ बस उन्हें इकठ्ठा करना चाहता हूँ…
Posted by lalit sharma on अक्टूबर 15, 2009 at 2:31 अपराह्न
ब्लॉग जगत में आपका स्वागत हैं, लेखन कार्य के लिए बधाई
धन तेरस पर्व की बधाई
Posted by shyam on अक्टूबर 15, 2009 at 7:33 अपराह्न
VISHESHKAR आँगन का रीतना कांव-कांव और बरगद की छांव शहर का गांव में दबे-पांव आना … ACHHI KAVITA, —मेरी शरीर पर चर्बी की परत का चढ़ना YEH ATIRIKT LGA … FIKR WALI KAVITA BHI PADI… MERE APNEY LIKHNEY MEIN KAI GALTIYAN HAIN AAPSEY KYA KAHOON. LAMBI DASH KE STHAN PR TEEN BINDU JACHTEY HAIN NAMR SUJHAV HAI AGRH NAHIN… DANYVAD
Posted by dr arvind mishra on अक्टूबर 20, 2009 at 6:43 अपराह्न
ओह मर्मस्पर्शी !
Posted by kumarjayant on नवम्बर 20, 2009 at 10:00 अपराह्न
kavitayen achchhi hai….
Posted by रवि कुमार, रावतभाटा on नवम्बर 20, 2009 at 11:03 अपराह्न
बेहतर बंधु…
आपकी कविताओं से गुजरना बेचैनी भरा रहा…
यह ताकत है….गुंजाईशों के साथ….