पहले पन्ने की कविता…

Diary_Pen

लिखूं,
कुछ डायरी के पृष्ठों पर कुछ घना-सघन,
जो घटा हो..मन में या तन से इतर.
लिखूं, पत्तों का सूखना
या आँगन का रीतना
कांव-कांव और बरगद की छांव
शहर का गांव में दबे-पांव आना या
गाँव का शहर के किनारे समाना या,
लिखूं माँ का साल दर साल बुढाना
कमजोर नज़र और स्वेटर का बुनते जाना
मेरी शरीर पर चर्बी की परत का चढ़ना
मन के बटुए का खाली होते जाना…
इस डायरी के पृष्ठों पर समानांतर रेखाएं हैं;
जीवन तो खुदा हुआ है ,बर-बस इसपर.
अब, और इतर क्या लिखना न कुछ पाना,
न कुछ खोना.

6 responses to this post.

  1. ज्यादातर कवितायेँ ब्लोग्स में पहले ही आ चुकी हैं, यहाँ बस उन्हें इकठ्ठा करना चाहता हूँ…

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  2. ब्लॉग जगत में आपका स्वागत हैं, लेखन कार्य के लिए बधाई
    धन तेरस पर्व की बधाई

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  3. VISHESHKAR आँगन का रीतना कांव-कांव और बरगद की छांव शहर का गांव में दबे-पांव आना … ACHHI KAVITA, —मेरी शरीर पर चर्बी की परत का चढ़ना YEH ATIRIKT LGA … FIKR WALI KAVITA BHI PADI… MERE APNEY LIKHNEY MEIN KAI GALTIYAN HAIN AAPSEY KYA KAHOON. LAMBI DASH KE STHAN PR TEEN BINDU JACHTEY HAIN NAMR SUJHAV HAI AGRH NAHIN… DANYVAD

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  4. ओह मर्मस्पर्शी !

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  5. kavitayen achchhi hai….

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  6. बेहतर बंधु…
    आपकी कविताओं से गुजरना बेचैनी भरा रहा…
    यह ताकत है….गुंजाईशों के साथ….

    Reply

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