Archive for अक्टूबर, 2009

….वो लड़कियां

“पाँव ;फूल पर आ गया , क्योंकि वो ‘गिरा’ हुआ था. …… पर ये ख़ुद तो नही गिरा होगा . .. इसका सौन्दर्य ,इसका घाती. तोड़ा…; पर सजाया नहीं इसे कहीं. … मुरझाना-सूखना तो सहज था; पर इस तरह,रौदा जाना ….. ,,… किसी ने इसे रास्ते में गिरा दिया. ..,,,..   ‘ठीक उन लड़कियों की [...]

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“…मुझमे तुम कितनी हो..?”

हर आहट, वो सरसराहट लगती है, जैसे डाल गया हो डाकिया; चिट्ठी दरवाजे के नीचे से. अब, हर आहट निराश करती है. हर महीने टुकड़ों में मिलने आती रही तुम देती दस्तक सरसराहटों से . सारी सरसराहटों से पूरी आहट कभी ना बना सके मै. तुम्हारे शब्दों से बिम्ब उकेरता मै, तुम्हे देख पाने के लिए…कागज [...]

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बैंडिट क्वीन

फिल्म देखा तो स्तब्ध रह गया था मै, मुझे विश्वास नहीं हुआ कि ऐसा हो सकता है. किसी एक जाति की ज्यादती की तो बात ही नहीं है, क्योकि जो भी शीर्ष पर रहा है, उससे ऐसी ज्यादतियां हुई हैं.पर मानवता सबसे कम मानवों में है, कभी-कभी ऐसा ही लगने लगता है……. खमोश सपाट बचपन, बच्ची [...]

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तुम मुस्कुरा रही हो; गंभीर

विस्तृत प्रांगण तिरछी लम्बी पगडंडी अभी बस हलकी चहल-पहल , विश्वविद्यालय में, दूर; उस सिरे से आती तुम गंभीर, किन्तु सौम्य, मद्धिम-मद्धिम तुम में एक मीठा तनाव है, शायद, हर एक-एक कदम पर जैसे सुलझा रही हो, एक-एक प्रश्न. तुम्हे पता हो, जैसे चंचल रहस्य. तुम्हें ‘पहचान’ नहीं सका था, मै, क्योंकि; देखा ही पहली [...]

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दीया, तुम जलना..

दीया, तुम जलना.. अंतरतम का मालिन्य मिटाना विद्युत-स्फूर्त ले आना. दीया, तुम जलना. जलना तुम मंदिर-मंदिर हर गांव नगर में जलना ऊंच-नीच का भेद ना करना हर चौखट तुम जलना बूढ़ी आँखों में तुम जलना उलझी रातों में तुम जलना अवसाद मिटाना हर चहरे का हर आँगन तुम खिलना दिया तुम जलना

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शायद फ़िक्र हो

स्मार्ट दूकानदार, मुस्कुराकर, अठन्नी वापस नहीं करता.. शायद फ़िक्र हो.. भिखमंगों की. नये कपड़ों की जरूरत लगातार बनी रहती है शायद फ़िक्र हो हमें, अधनंगों की. चीजें कुछ फैशन के लिहाज से पुरानी पड़ जाती हैं, इमारतों को फ़िक्र हो जैसे, नर-शूकरों की. मासूम बच्चे, उनके कुत्ते, नहलाते हैं; शायद फ़िक्र हो उन्हें, अभागों की. [...]

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पहले पन्ने की कविता…

लिखूं, कुछ डायरी के पृष्ठों पर कुछ घना-सघन, जो घटा हो..मन में या तन से इतर. लिखूं, पत्तों का सूखना या आँगन का रीतना कांव-कांव और बरगद की छांव शहर का गांव में दबे-पांव आना या गाँव का शहर के किनारे समाना या, लिखूं माँ का साल दर साल बुढाना कमजोर नज़र और स्वेटर का [...]

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